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तकनीकी जटिलता नहीं, नागरिक सुविधा ही सच्चा ई-गवर्नेंस: राष्ट्रीय सम्मेलन में बोले मुख्यमंत्री सुक्खू

  • धर्मशाला में प्रशासनिक सुधार और ई-गवर्नेंस पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू

  • तकनीक का असली पैमाना आम नागरिक के जीवन को सरल और पारदर्शी बनाना

  • पहाड़ी राज्यों के योगदान और पर्यावरणीय सुरक्षा के बदले केंद्र से न्यायसंगत हिस्सेदारी की मांग


हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने धर्मशाला में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि सुशासन किसी भी जनहितैषी सरकार की पहली शर्त है। ई-गवर्नेंस की असली सफलता किसी जटिल तकनीकी ढांचे में नहीं, बल्कि इस बात में निहित है कि वह दूरदराज और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का जीवन कितना सरल बनाती है। पारंपरिक नौकरशाही की सीमाओं से बाहर निकलकर हमें एक ऐसी जवाबदेह, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित व्यवस्था बनानी होगी जहां आम आदमी को अपने अधिकारों के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वर्तमान सरकार सत्ता की सुख-सुविधाओं के उपभोग के लिए नहीं, बल्कि ठोस व्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य के साथ काम कर रही है। राज्य के संसाधनों का सीधा लाभ जनता तक पहुंचाने के लिए डिजिटल पहलों को जमीनी स्तर पर उतारा गया है। शिक्षा क्षेत्र में सुनियोजित नीतिगत सुधारों का ही परिणाम है कि वर्ष 2021 में देश में 21वें स्थान पर रहने वाला हिमाचल प्रदेश अब लंबी छलांग लगाकर राष्ट्रीय स्तर पर 5वें स्थान पर पहुंच चुका है।

स्वास्थ्य सेवाओं को सरकार की दूसरी सबसे बड़ी प्राथमिकता बताते हुए उन्होंने कहा कि राज्य के चिकित्सा संस्थानों में रोबोटिक सर्जरी की शुरुआत की गई है। साथ ही 15 से 19 साल पुराने चिकित्सा उपकरणों को बदलकर मेडिकल कॉलेजों में विश्वस्तरीय सुविधाएं सुनिश्चित की जा रही हैं, ताकि स्थानीय निवासियों को महंगे इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े। अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए पीजी सीटों में बढ़ोतरी, वेतन वृद्धि और डॉक्टरों व पैरा-मेडिकल स्टाफ की नियमित भर्तियां की गई हैं।

प्रदेश की 90 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में बसती है, इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना तीसरी सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसानों व पशुपालकों की आय में सम्मानजनक वृद्धि के लिए देश में गाय और भैंस के दूध पर सबसे अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू किया गया है। बड़े पैमाने पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए प्राकृतिक गेहूं 80 रुपये, कच्ची हल्दी 150 रुपये, मक्का 50 रुपये और अदरक 30 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जा रहा है।

प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए सिंगल विंडो सिटीजन पोर्टल और लोक मित्र केंद्रों का दायरा बढ़ाया गया है, जिससे लोग घर बैठे सरकारी सेवाओं का लाभ ले रहे हैं। मुख्यमंत्री सेवा संकल्प हेल्पलाइन के जरिए दर्ज शिकायतों का निपटारा तब तक अंतिम नहीं माना जाता, जब तक शिकायतकर्ता संतुष्ट न हो। इसके अलावा राजस्व अदालतों और रेवेन्यू मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से वर्षों से लंबित तकसीम, इंतकाल और निशानदेही के हजारों विवादों को तेजी से सुलझाया गया है।

सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में अनाथ बच्चों को चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट का कानूनी दर्जा देकर उनकी पढ़ाई, कोचिंग, वस्त्र, विवाह और आवास का पूरा जिम्मा सरकार ने उठाया है। 12 लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले परिवारों के मेधावी छात्रों को देश-विदेश में उच्च शिक्षा के लिए मात्र 1 प्रतिशत ब्याज दर पर 20 लाख रुपये तक का शिक्षा ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण की दिशा में इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देकर ग्रीन हिमाचल का संकल्प पूरा किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने अंत में पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिमाचल के वन, नदियां और जलविद्युत संसाधन देश की ऊर्जा और पर्यावरण सुरक्षा में बहुत बड़ा योगदान देते हैं, जबकि आपदाओं और पारिस्थितिक संरक्षण का भारी वित्तीय बोझ अकेले राज्य उठाता है। इसलिए केंद्र सरकार को जलविद्युत परियोजनाओं, रॉयल्टी, वाटर सेस और केंद्रीय वित्तीय सहायता में पहाड़ी राज्यों के हितों का तर्कसंगत और निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए।

सम्मेलन में प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (DARPG) की सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा, मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना, विभिन्न विभागों के प्रशासनिक सचिवों सहित कृषि मंत्री प्रो. चंद्र कुमार, ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह, आयुष मंत्री यादविंदर गोमा और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।